Environmental Sustainability Archives - Sansar Green https://sansargreen.org/tag/environmental-sustainability/ (प्रयोगशाला से खेत तक, ज्ञान से समृद्धि तक) Sun, 11 Oct 2026 09:55:24 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.4 https://sansargreen.org/wp-content/uploads/2026/10/Logo-Sansar-Green-Small.png Environmental Sustainability Archives - Sansar Green https://sansargreen.org/tag/environmental-sustainability/ 32 32 गिरिडीह में होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का लोकार्पण, आदिवासी ज्ञान और औषधीय पौधों के संरक्षण की पहल https://sansargreen.org/rajeev-singh-hodopathy-website-launch-plant-conservation/ Sun, 11 Oct 2026 09:42:47 +0000 https://sansargreen.org/?p=1984 पर्यावरणविद् राजीव सिंह ने पारंपरिक आदिवासी बुजुर्गों की उपस्थिति में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का किया शुभारंभ। सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत को डिजिटल माध्यम से सहेजने, औषधीय पौधों के संरक्षण और जंगलों की जैव विविधता बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण Read More ...

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पर्यावरणविद् राजीव सिंह ने पारंपरिक आदिवासी बुजुर्गों की उपस्थिति में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का किया शुभारंभ। सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत को डिजिटल माध्यम से सहेजने, औषधीय पौधों के संरक्षण और जंगलों की जैव विविधता बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल।

गिरिडीह, झारखंड | 8 अक्टूबर 2026

झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति होड़ोपैथी (Hodopathy), औषधीय पौधों और जंगलों से जुड़े ज्ञान को संरक्षित करने के उद्देश्य से गिरिडीह में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। पर्यावरणविद्, कृषि उद्यमी एवं सतत विकास के क्षेत्र में कार्यरत राजीव सिंह ने 8 अक्टूबर 2026 को होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों—Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com—का लोकार्पण किया।

गिरिडीह स्थित उनके आवासीय कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में आदिवासी समाज के पारंपरिक बुजुर्गों, स्थानीय ज्ञानधारकों, सामाजिक प्रतिनिधियों और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित आदिवासी ज्ञान को आधुनिक डिजिटल तकनीक से जोड़ना और इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना है।

इस पहल के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण के साथ-साथ औषधीय पौधों की पहचान, उनके संरक्षण, जंगलों की जैव विविधता, पर्यावरणीय जागरूकता तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को भी प्रोत्साहित करने की योजना है।

सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत को सहेजने का प्रयास

होड़ोपैथी झारखंड के आदिवासी समुदायों से जुड़ी एक पारंपरिक स्वदेशी चिकित्सा एवं वनस्पति ज्ञान प्रणाली है। यह पीढ़ियों से प्रकृति, जंगलों और स्थानीय औषधीय पौधों के साथ आदिवासी समाज के गहरे संबंधों को दर्शाती है।

आदिवासी समाज के बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों के पास स्थानीय वनस्पतियों की पहचान, उनके पारंपरिक उपयोग, संरक्षण तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन से संबंधित व्यापक अनुभवजन्य ज्ञान रहा है।

इस ज्ञान का बड़ा हिस्सा लिखित पुस्तकों के बजाय मौखिक परंपराओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता रहा है।

बदलती जीवनशैली, नई पीढ़ी का पारंपरिक ज्ञान से दूर होना, जंगलों का क्षरण और औषधीय पौधों के प्राकृतिक आवासों पर बढ़ते दबाव के कारण इस विरासत के संरक्षण की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।

ऐसी स्थिति में होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का शुभारंभ पारंपरिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने और उसके संरक्षण के लिए एक डिजिटल आधार तैयार करने का प्रयास है।

तीन वेबसाइटों के माध्यम से डिजिटल संरक्षण की शुरुआत

लोकार्पित तीनों वेबसाइटों का उद्देश्य होड़ोपैथी से संबंधित जानकारी, पारंपरिक ज्ञान, औषधीय पौधों और पर्यावरण संरक्षण के विषयों को व्यापक स्तर पर सामने लाना है।

Hodopathy.org के माध्यम से आदिवासी ज्ञान-विरासत, औषधीय पौधों और जैव विविधता संरक्षण से जुड़े विषयों को प्रोत्साहित करने की परिकल्पना की गई है।

Hodopathy.in का उद्देश्य होड़ोपैथी की पारंपरिक पृष्ठभूमि, स्वदेशी ज्ञान, वनस्पतियों और संभावित वैज्ञानिक अध्ययन से संबंधित जानकारी को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना है।

Hodopathy.com के माध्यम से जनजागरूकता, शैक्षणिक सामग्री और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण संबंधी गतिविधियों को व्यापक लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया जाएगा।

इन तीनों डिजिटल मंचों को भविष्य में पारंपरिक ज्ञानधारकों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों के बीच संवाद का माध्यम बनाने की परिकल्पना है।

आदिवासी बुजुर्गों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को बनाया विशेष

लोकार्पण कार्यक्रम की विशेषता आदिवासी समाज के पारंपरिक बुजुर्गों और स्थानीय ज्ञानधारकों की भागीदारी रही।

ये बुजुर्ग उस ज्ञान परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिसे उनके पूर्वजों ने सदियों तक अनुभव, अवलोकन और प्रकृति के साथ निरंतर संपर्क के माध्यम से संरक्षित रखा है।

कार्यक्रम में उनकी भागीदारी इस बात का प्रतीक रही कि होड़ोपैथी का संरक्षण केवल वेबसाइट बनाने या जानकारी एकत्र करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मूल ज्ञानधारकों का सम्मान और सक्रिय सहयोग आवश्यक है।

पहल के अंतर्गत भविष्य में अनुभवी बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों से संवाद स्थापित कर उनकी सहमति से ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की योजना है।

इस दौरान स्थानीय पौधों के नाम, उनकी पहचान, पारंपरिक उपयोग से जुड़े सांस्कृतिक संदर्भ तथा पर्यावरणीय अनुभवों को सुरक्षित रखने पर ध्यान दिया जाएगा।

राजीव सिंह की पहल: ज्ञान के साथ जंगलों को भी बचाना जरूरी

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत राजीव सिंह की यह पहल पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करती है।

आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ जंगलों, औषधीय वनस्पतियों, स्थानीय जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी रही हैं।

यदि जंगलों में पाए जाने वाले औषधीय पौधे समाप्त होते हैं, तो उनके साथ उनसे संबंधित पारंपरिक जानकारी के लुप्त होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

इसी प्रकार, यदि अनुभवी ज्ञानधारकों के अनुभवों को समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से से वंचित हो सकती हैं।

इसलिए होड़ोपैथी पहल का उद्देश्य केवल पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना नहीं, बल्कि औषधीय पौधों के संरक्षण, जंगलों की सुरक्षा और पर्यावरणीय जागरूकता को भी बढ़ावा देना है।

यह प्रयास सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण को एक-दूसरे से जोड़ता है।

गांडेय में होड़ोपैथी पार्क से औषधीय पौधों के संरक्षण को बढ़ावा

इस पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गिरिडीह जिले के गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क से भी जुड़ा है।

होड़ोपैथी पार्क की परिकल्पना औषधीय पौधों के संरक्षण, पहचान, संवर्धन और पर्यावरणीय शिक्षा को बढ़ावा देने वाले केंद्र के रूप में की गई है।

इसके माध्यम से स्थानीय स्तर पर औषधीय पौधों की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण तथा उनके पारंपरिक और पारिस्थितिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने की योजना है।

भविष्य में यहाँ विद्यार्थियों, युवाओं, पर्यावरण प्रेमियों और पारंपरिक ज्ञानधारकों के लिए शैक्षणिक एवं जागरूकता गतिविधियाँ आयोजित करने की संभावनाएँ भी हैं।

इस प्रकार डिजिटल दस्तावेजीकरण और धरातल पर वनस्पति संरक्षण के प्रयासों को एक साथ आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य किया जाएगा।

पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों का दस्तावेजीकरण और पुस्तक प्रकाशन की योजना

होड़ोपैथी पहल के अंतर्गत आदिवासी बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों को व्यवस्थित रूप से संकलित करने की योजना भी बनाई गई है।

इसका उद्देश्य स्थानीय ज्ञान, वनस्पतियों की पहचान, पारंपरिक प्रथाओं और उनसे जुड़े सांस्कृतिक अनुभवों को सुरक्षित रखना है।

इसके साथ ही अनुभवी ज्ञानधारकों की जानकारी और योगदान पर आधारित एक पुस्तक तैयार करने की भी परिकल्पना है।

इससे मौखिक परंपराओं में संरक्षित जानकारी को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाने में सहायता मिल सकती है।

हालाँकि, पारंपरिक उपचार संबंधी जानकारी का दस्तावेजीकरण और किसी उपचार की वैज्ञानिक प्रभावशीलता सिद्ध होना अलग-अलग विषय हैं। औषधीय उपयोगों की सुरक्षा एवं प्रभावशीलता का मूल्यांकन उपयुक्त वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से किया जाना आवश्यक होगा।

ज्ञान संग्रह के दौरान संबंधित समुदायों की सहमति, पारंपरिक अधिकारों और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का सम्मान करना भी इस पहल का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

वैज्ञानिक अनुसंधान और विश्वविद्यालयों से सहयोग की संभावनाएँ

होड़ोपैथी से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अध्ययन से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास करने की योजना है।

इसके अंतर्गत औषधीय पौधों की वैज्ञानिक पहचान, वनस्पति विविधता, संरक्षण तकनीकों और पारंपरिक उपयोगों से संबंधित अध्ययन की संभावनाएँ तलाशने का उद्देश्य है।

भविष्य में विश्वविद्यालयों, कृषि एवं वनस्पति अनुसंधान संस्थानों तथा विषय विशेषज्ञों के साथ सहयोग स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।

ऐसे सहयोग से पारंपरिक ज्ञान के जिम्मेदार दस्तावेजीकरण, वनस्पति संरक्षण और वैज्ञानिक समझ को आगे बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

युवाओं को जोड़कर अगली पीढ़ी तक पहुँचाई जाएगी विरासत

होड़ोपैथी पहल में युवाओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

आने वाले समय में स्थानीय युवाओं को औषधीय पौधों की पहचान, पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता संबंधी जागरूकता गतिविधियों से जोड़ने की योजना है।

युवा पीढ़ी डिजिटल तकनीक के माध्यम से बुजुर्गों के अनुभवों को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इसके लिए भविष्य में प्रशिक्षण कार्यक्रम, संवाद सत्र, वनस्पति पहचान गतिविधियाँ और पर्यावरणीय जागरूकता अभियान आयोजित करने की संभावनाएँ हैं।

इस प्रयास से पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के बीच एक सार्थक संबंध विकसित हो सकता है।

आदिवासी समुदायों के अधिकार और सम्मान को प्राथमिकता

पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण तभी सार्थक होगा, जब उसके मूल ज्ञानधारकों और संबंधित समुदायों के अधिकारों का सम्मान किया जाए।

होड़ोपैथी पहल में ज्ञान के दस्तावेजीकरण के दौरान संबंधित व्यक्तियों और समुदायों की सहमति, उनके योगदान की पहचान तथा संवेदनशील जानकारी के जिम्मेदार उपयोग को महत्व देने की बात कही गई है।

इसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से अलग किए बिना सुरक्षित रखना है।

भविष्य में किसी शोध, प्रकाशन या व्यावसायिक उपयोग की स्थिति में लागू कानूनी प्रावधानों और समुदायों के अधिकारों का पालन करना आवश्यक होगा।

झारखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की नई दिशा

झारखंड के आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ राज्य की सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का 8 अक्टूबर 2026 को हुआ लोकार्पण इस विरासत को डिजिटल माध्यम से संरक्षित करने की दिशा में एक शुरुआती कदम है।

इस पहल के माध्यम से पारंपरिक बुजुर्गों के अनुभवों, औषधीय पौधों के संरक्षण, जंगलों की जैव विविधता और वैज्ञानिक अध्ययन की संभावनाओं को एक साझा मंच से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

इसका दीर्घकालिक उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना है, जिसमें आदिवासी समाज की पारंपरिक जानकारी को सम्मान मिले, युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा मिले।

होड़ोपैथी की इस पहल का मूल संदेश है कि सदियों पुराने आदिवासी ज्ञान को बचाने के लिए उसके ज्ञानधारकों, औषधीय पौधों, जंगलों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।

Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com के माध्यम से इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा, ताकि झारखंड की अमूल्य आदिवासी ज्ञान-विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए जिम्मेदारीपूर्वक सुरक्षित रखा जा सके।


होड़ोपैथी पहल के बारे में

होड़ोपैथी पहल पर्यावरणविद् राजीव सिंह द्वारा गिरिडीह, झारखंड में आगे बढ़ाया जा रहा एक प्रयास है, जिसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण, औषधीय पौधों का संवर्धन, जंगलों की जैव विविधता की सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहन और युवाओं में पर्यावरणीय जागरूकता विकसित करना है।

आधिकारिक वेबसाइटें:

कार्यक्रम: होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का लोकार्पण
तिथि: 8 अक्टूबर 2026
स्थान: गिरिडीह, झारखंड
लोकार्पणकर्ता: राजीव सिंह
प्रमुख सहभागी: पारंपरिक आदिवासी बुजुर्ग, स्थानीय ज्ञानधारक एवं सामुदायिक प्रतिनिधि
मुख्य उद्देश्य: आदिवासी ज्ञान-विरासत का डिजिटल संरक्षण, औषधीय पौधों का संवर्धन एवं वन जैव विविधता की सुरक्षा

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द टाइम्स ऑफ इंडिया में राजीव सिंह की पहल को प्रमुखता: आदिवासी ज्ञान, औषधीय पौधों और वन संरक्षण पर जोर https://sansargreen.org/times-of-india-rajeev-singh-medicinal-plant-conservation/ Sun, 11 Oct 2026 08:29:25 +0000 https://sansargreen.org/?p=1979 द टाइम्स ऑफ इंडिया | रांची संस्करण | 9 अक्टूबर 2026 झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी पारंपरिक ज्ञान-विरासत, औषधीय वनस्पतियों और जंगलों के संरक्षण के लिए पर्यावरणविद् एवं कृषि उद्यमी राजीव सिंह की पहल को देश के प्रमुख Read More ...

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द टाइम्स ऑफ इंडिया | रांची संस्करण | 9 अक्टूबर 2026

झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी पारंपरिक ज्ञान-विरासत, औषधीय वनस्पतियों और जंगलों के संरक्षण के लिए पर्यावरणविद् एवं कृषि उद्यमी राजीव सिंह की पहल को देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र द टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने 9 अक्टूबर 2026 के रांची संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया। समाचार में पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान-प्रणाली होड़ोपैथी के संरक्षण को पर्यावरणीय स्थिरता, जैव विविधता और वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने के प्रयासों को विशेष स्थान दिया गया।

गिरिडीह में आयोजित कार्यक्रम में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का शुभारंभ किया गया। इन डिजिटल मंचों का उद्देश्य आदिवासी बुजुर्गों, पारंपरिक वैद्यों और स्थानीय ज्ञानधारकों के अनुभवों को दस्तावेजीकृत करना तथा औषधीय पौधों से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है।

समाचार के अनुसार, अभियान तीन चरणों में आगे बढ़ेगा। पहले चरण में पारंपरिक ज्ञान का डिजिटल संग्रह तैयार किया जाएगा। दूसरे चरण में अनुभवी वैद्यों के अनुभवों और औषधीय वनस्पतियों पर पुस्तक प्रकाशित करने की योजना है। तीसरे चरण में युवाओं को पौधों की पहचान, संरक्षण और दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण देने के साथ शोध संस्थानों के सहयोग से वैज्ञानिक अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाएगा।

इस पहल से गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क को भी जोड़ा गया है, जिसके माध्यम से स्थानीय औषधीय पौधों के संरक्षण, संवर्धन और वन जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाने का उद्देश्य है।

राजीव सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए उससे जुड़े जंगलों, औषधीय पौधों और प्राकृतिक आवासों का संरक्षण भी आवश्यक है। अभियान में ज्ञानधारकों की सहमति, अधिकारों और योगदान का सम्मान करते हुए स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता दी जाएगी।

यह पहल पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रकृति संरक्षण के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक प्रयास है। इसका व्यापक उद्देश्य झारखंड की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामाजिक जागरूकता बढ़ाना है।

साभार: द टाइम्स ऑफ इंडिया, रांची संस्करण, पृष्ठ 5, 9 अक्टूबर 2026।

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दैनिक हिन्दुस्तान में प्रमुखता से प्रकाशित: IIT (ISM) धनबाद और संसार ग्रीन की पहल से सूखे पत्ते बनेंगे समृद्ध जैविक खाद https://sansargreen.org/dainik-hindustan-iit-ism-dhanbad-sansar-green-dry-leaves/ Sat, 19 Sep 2026 09:33:49 +0000 https://sansargreen.org/?p=1928 16 सितंबर 2026 के धनबाद संस्करण में दैनिक हिन्दुस्तान ने “सूखे पत्तों को ऑर्गेनिक खाद में बदलने की तैयारी” शीर्षक से प्रकाशित की खबर धनबाद | 16 सितंबर 2026 आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान के इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन मिशन Read More ...

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16 सितंबर 2026 के धनबाद संस्करण में दैनिक हिन्दुस्तान ने “सूखे पत्तों को ऑर्गेनिक खाद में बदलने की तैयारी” शीर्षक से प्रकाशित की खबर

धनबाद | 16 सितंबर 2026

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान के इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन मिशन प्राइवेट लिमिटेड की सूखे पत्तों को उपयोगी जैविक खाद में बदलने की प्रस्तावित पहल को दैनिक हिन्दुस्तान ने अपने धनबाद संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

16 सितंबर 2026 को प्रकाशित खबर में दैनिक हिन्दुस्तान ने “सूखे पत्तों को ऑर्गेनिक खाद में बदलने की तैयारी” शीर्षक के साथ इस पहल को पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबल वेस्ट मैनेजमेंट की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया है।

[यहां दैनिक हिन्दुस्तान की प्रकाशित न्यूज कटिंग लगाएं]

सूखे पत्तों को कचरा नहीं, उपयोगी संसाधन बनाने की पहल

दैनिक हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद अपने इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन के साथ मिलकर पेड़ों से गिरने वाले सूखे और बेकार पत्तों को पोषक तत्वों से समृद्ध जैविक खाद में बदलने की तैयारी कर रहा है।

इस पहल का उद्देश्य सूखी पत्तियों को जलाने या बेकार फेंकने के बजाय उनका उपयोग करना, मिट्टी की सेहत सुधारना और जैविक खेती को बढ़ावा देना है।

बड़े संस्थागत परिसरों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां निकलती हैं। इन्हें जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ सकता है, जबकि गलत तरीके से फेंकने पर इनमें मौजूद उपयोगी जैविक पदार्थ भी बेकार चला जाता है।

इसी समस्या को एक उपयोगी संसाधन में बदलना इस पहल की मूल अवधारणा है।

IIT (ISM) धनबाद में हुई रणनीतिक चर्चा

दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित रिपोर्ट में परियोजना को लेकर आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में हुई रणनीतिक चर्चा का भी उल्लेख किया गया है।

इस चर्चा में प्रो. आलोक कुमार दास, डीन, इनोवेशन एंड कॉरपोरेट रिलेशंस, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद; संसार ग्रीन के निदेशक राजीव सिंह; धनबाद की जिला कृषि पदाधिकारी अंजना; तथा आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के सहायक कुलसचिव मृत्युंजय शर्मा शामिल हुए।

परियोजना के तहत सूखी पत्तियों को वैज्ञानिक प्रक्रिया से उपयोगी जैविक खाद में बदलने और उन्हें मिट्टी के लिए पुनः उपयोगी बनाने की दिशा में काम किया जाना प्रस्तावित है।

पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य को एक साथ जोड़ने का प्रयास

संसार ग्रीन के लिए यह पहल केवल सूखी पत्तियों के निस्तारण का विषय नहीं है। इसका उद्देश्य green waste management को मृदा स्वास्थ्य और जैविक कृषि से जोड़ना है।

सूखी पत्तियां अपने आप में जैविक पदार्थ का स्रोत हैं। उचित वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से इन्हें उपयोगी जैविक खाद में परिवर्तित कर पुनः मिट्टी तक पहुंचाया जा सकता है।

इस मॉडल का मूल विचार है:

सूखी पत्तियां → वैज्ञानिक प्रसंस्करण → समृद्ध जैविक खाद → बेहतर मृदा स्वास्थ्य → जैविक खेती

इस प्रकार जो जैविक पदार्थ पेड़ और मिट्टी से उत्पन्न हुआ है, उसे कचरे के रूप में नष्ट करने के बजाय दोबारा मिट्टी के जैविक चक्र में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है।

दैनिक हिन्दुस्तान की खबर ने पहल के पर्यावरणीय महत्व को किया रेखांकित

दैनिक हिन्दुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया कि सूखी पत्तियों को जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जबकि उनका वैज्ञानिक उपयोग पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की सेहत—दोनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

रिपोर्ट में प्रो. आलोक कुमार दास के हवाले से भी इस विचार को सामने रखा गया है कि सूखे पत्ते केवल कचरा नहीं, बल्कि जैविक पदार्थ का एक उपयोगी स्रोत हैं।

संसार ग्रीन का प्रयास इसी संसाधन को वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके से उपयोग में लाकर Waste-to-Wealth की अवधारणा को जमीन पर लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना है।

संसार ग्रीन की प्रतिबद्धता

संसार ग्रीन मिशन प्राइवेट लिमिटेड मृदा स्वास्थ्य, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी, जैविक कृषि और पर्यावरण-अनुकूल समाधानों पर कार्य कर रहा है। IIT (ISM) धनबाद के साथ प्रस्तावित यह पहल संस्थागत स्तर पर उत्पन्न होने वाले सूखे पत्तों के बेहतर उपयोग का एक व्यावहारिक मॉडल विकसित करने की दिशा में प्रयास है।

दैनिक हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख समाचार पत्र में इस पहल का प्रकाशन इस विषय को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संसार ग्रीन का मानना है कि सूखी पत्तियों को समस्या के रूप में देखने के बजाय उन्हें मिट्टी के लिए उपयोगी संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है—

“कचरे में नहीं, मिट्टी में लौटें सूखे पत्ते।”

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Media Coverage: IIT (ISM) Dhanbad और Sansar Green की पहल—सूखी पत्तियों से समृद्ध जैविक खाद https://sansargreen.org/iit-ism-dhanbad-sansar-green-dry-leaf-waste-to-wealth/ Sat, 19 Sep 2026 05:09:34 +0000 https://sansargreen.org/?p=1910 IIT (ISM) परिसर की सूखी पत्तियों को पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध जैविक खाद में बदलने की दिशा में Sansar Green की पहल धनबाद | सितंबर 2026 आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान में इनक्यूबेटेड स्टार्टअप Sansar Green Mission Read More ...

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IIT (ISM) परिसर की सूखी पत्तियों को पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध जैविक खाद में बदलने की दिशा में Sansar Green की पहल

धनबाद | सितंबर 2026

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान में इनक्यूबेटेड स्टार्टअप Sansar Green Mission Private Limited की सूखी पत्तियों को उपयोगी जैविक खाद में बदलने की प्रस्तावित पहल को प्रमुख समाचार माध्यमों में स्थान मिला है।

इस पहल का उद्देश्य आईआईटी (आईएसएम) धनबाद परिसर में बड़ी मात्रा में एकत्र होने वाली सूखी पत्तियों का वैज्ञानिक तरीके से अपघटन कर उन्हें पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध जैविक खाद में परिवर्तित करना है।

यह प्रयास केवल सूखी पत्तियों के निस्तारण तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, हरित कचरा प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, जैविक खेती और सर्कुलर इकोनॉमी को एक व्यावहारिक “Waste to Wealth” मॉडल से जोड़ने की दिशा में एक पहल है।

सूखी पत्तियों से मृदा के लिए उपयोगी संसाधन

बड़े शैक्षणिक परिसरों, सार्वजनिक संस्थानों, आवासीय परिसरों और अन्य हरित क्षेत्रों में हर वर्ष बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां एकत्र होती हैं। इन पत्तियों को जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ सकता है, जबकि इन्हें सामान्य कचरे के रूप में हटाने से इनमें मौजूद जैविक पदार्थ का उपयोग नहीं हो पाता।

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और Sansar Green की प्रस्तावित पहल इसी जैविक पदार्थ को पुनः मृदा चक्र में लाने की दिशा में काम करेगी।

परिसर से एकत्र सूखी पत्तियों का वैज्ञानिक तरीके से अपघटन किया जाएगा। इसके बाद तैयार जैविक पदार्थ को आवश्यक पोषक तत्वों और चयनित लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध करने की योजना है, ताकि इसे मृदा और पौधों के लिए उपयोगी जैविक खाद के रूप में विकसित किया जा सके।

प्रस्तावित प्रक्रिया को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है:

सूखी पत्तियां → वैज्ञानिक अपघटन → पोषक तत्व एवं सूक्ष्मजीव संवर्धन → समृद्ध जैविक खाद → बेहतर मृदा स्वास्थ्य

इस प्रकार सूखी पत्तियों को केवल कचरे के रूप में हटाने के बजाय उन्हें एक उपयोगी जैविक संसाधन में बदलने का प्रयास किया जाएगा।

मृदा स्वास्थ्य और माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी पर विशेष ध्यान

इस पहल से संबंधित रणनीतिक चर्चा में Sansar Green Mission Private Limited के निदेशक राजीव सिंह के साथ आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के प्रो. आलोक कुमार दास, जिला कृषि पदाधिकारी अंजना तथा आईआईटी (आईएसएम) के सहायक कुलसचिव मृत्युंजय शर्मा शामिल रहे।

Sansar Green के लिए यह पहल कंपनी के मृदा स्वास्थ्य, जैविक कृषि, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी और वैज्ञानिक कृषि समाधानों से जुड़े व्यापक कार्य का भी विस्तार है।

Sansar Green और IIT (ISM) Dhanbad के बीच सहयोग केवल सूखी पत्तियों से खाद बनाने की इस पहल तक सीमित नहीं है। अगस्त 2025 में CIIE, IIT (ISM) Dhanbad Foundation और Sansar Green के बीच AI-आधारित जैविक कृषि समाधानों को लेकर रणनीतिक सहयोग की आधिकारिक घोषणा भी की गई थी।

उस पहल में मृदा स्वास्थ्य विश्लेषण, तकनीक आधारित कृषि समाधान तथा क्षेत्र-विशिष्ट माइक्रोबियल स्ट्रेन का उपयोग कर जैव उर्वरक विकसित करने जैसे विषय शामिल थे।

इस दृष्टि से सूखी पत्तियों से समृद्ध जैविक खाद तैयार करने की नई पहल वैज्ञानिक अनुसंधान, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी और व्यावहारिक पर्यावरणीय समाधान को एक साथ जोड़ने की दिशा में एक और कदम है।

उत्पादन और संचालन में Sansar Green करेगा निवेश

प्रस्तावित मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता IIT (ISM) Dhanbad और Sansar Green के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन है।

प्रकाशित समाचारों के अनुसार, परियोजना के लिए आवश्यक मशीनरी, उपकरण, मानव संसाधन, उत्पादन और संचालन से संबंधित खर्च Sansar Green द्वारा वहन किए जाने का प्रस्ताव है।

वहीं IIT (ISM) Dhanbad द्वारा उत्पादन इकाई तथा तैयार जैविक खाद के भंडारण के लिए आवश्यक स्थान उपलब्ध कराने की योजना है।

इस व्यवस्था के माध्यम से संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप की तकनीकी एवं परिचालन क्षमता को एक साझा मॉडल में उपयोग किया जा सकेगा।

लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध होगी जैविक खाद

स्वस्थ मृदा के लिए केवल जैविक पदार्थ की मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं होती। मृदा में होने वाली जैविक गतिविधियां और लाभकारी सूक्ष्मजीव भी पोषक तत्वों के चक्र तथा पौधों की वृद्धि से जुड़ी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसी कारण प्रस्तावित पहल को सामान्य पत्ती कम्पोस्टिंग तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक रूप से अपघटित जैविक पदार्थ को आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध करने की परिकल्पना की गई है।

इससे तैयार जैविक खाद का उपयोग बागवानी, नर्सरी, पौधरोपण, लैंडस्केपिंग, जैविक खेती और मृदा सुधार जैसी गतिविधियों में किया जा सकेगा।

परिसर से किसानों और आम लोगों तक

तैयार जैविक खाद का उपयोग IIT (ISM) Dhanbad परिसर के उद्यानों, नर्सरी, पौधरोपण और लैंडस्केपिंग कार्यों में किए जाने की योजना है।

इसके साथ ही प्रकाशित रिपोर्टों में इसे किसानों, बागवानों, नर्सरी संचालकों और आम लोगों तक उपलब्ध कराने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है।

इस प्रकार परियोजना का प्रभाव केवल कैंपस के हरित कचरे के प्रबंधन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे तैयार उपयोगी जैविक उत्पाद को कृषि और बागवानी से जोड़ने की भी संभावना है।

यदि यह मॉडल व्यावहारिक और सफल सिद्ध होता है, तो भविष्य में विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों, औद्योगिक परिसरों, आवासीय सोसायटियों और अन्य बड़े परिसरों में उत्पन्न होने वाले जैविक हरित कचरे के प्रबंधन के लिए भी इस तरह के मॉडल पर विचार किया जा सकता है।

Rajeev Singh of Sansar Green with IIT (ISM) Dhanbad representatives during a discussion on converting campus dry leaves into nutrient- and beneficial microorganism-enriched organic manure.
Discussion on the IIT (ISM) Dhanbad and Sansar Green initiative for scientific utilisation of dry leaves to support soil health and sustainable green-waste management.

Waste to Wealth की व्यावहारिक अवधारणा

इस पहल के केंद्र में चार प्रमुख क्षेत्र जुड़े हैं:

Waste to Wealth | Soil Health | Microbial Technology | Circular Economy

इस अवधारणा में सूखी पत्तियों को हटाए जाने वाले कचरे के रूप में देखने के बजाय उनमें मौजूद जैविक पदार्थ को पुनः मृदा में लौटाने योग्य संसाधन के रूप में देखा जाता है।

Sansar Green के लिए यह पहल विज्ञान, सूक्ष्मजीवों और तकनीक के माध्यम से कृषि एवं पर्यावरण से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं के समाधान विकसित करने की दिशा में उसके कार्यों से जुड़ती है।

वहीं IIT (ISM) Dhanbad परिसर इस प्रकार की टिकाऊ तकनीकों और प्रक्रियाओं को विकसित करने तथा व्यावहारिक स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए एक उपयुक्त मंच प्रदान कर सकता है।

कचरे से वापस मिट्टी तक

इस पहल का मूल विचार सरल है—पेड़ से गिरने के बाद सूखी पत्ती का सफर कचरे पर समाप्त होना आवश्यक नहीं है।

वैज्ञानिक अपघटन, पोषक तत्वों के संवर्धन और लाभकारी सूक्ष्मजीवों के उपयोग के माध्यम से यही पत्तियां दोबारा मृदा के लिए उपयोगी जैविक संसाधन बन सकती हैं।

सफल क्रियान्वयन की स्थिति में IIT (ISM) Dhanbad और Sansar Green की यह पहल यह प्रदर्शित कर सकती है कि संस्थागत स्तर पर उत्पन्न हरित कचरे का प्रबंधन उसके स्रोत के निकट ही करते हुए उससे मृदा और पौधों के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार किया जा सकता है।

यही सर्कुलर इकोनॉमी की मूल भावना भी है—

कचरा एक संसाधन में बदलता है।
जैविक पदार्थ वापस मिट्टी तक पहुंचता है।
लाभकारी सूक्ष्मजीव मृदा की जैविक प्रक्रियाओं में योगदान देते हैं।
और प्रकृति का चक्र फिर से शुरू होता है।

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