Jharkhand News Archives - Sansar Green https://sansargreen.org/tag/jharkhand-news/ (प्रयोगशाला से खेत तक, ज्ञान से समृद्धि तक) Sun, 11 Oct 2026 09:55:24 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.4 https://sansargreen.org/wp-content/uploads/2026/10/Logo-Sansar-Green-Small.png Jharkhand News Archives - Sansar Green https://sansargreen.org/tag/jharkhand-news/ 32 32 गिरिडीह में होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का लोकार्पण, आदिवासी ज्ञान और औषधीय पौधों के संरक्षण की पहल https://sansargreen.org/rajeev-singh-hodopathy-website-launch-plant-conservation/ Sun, 11 Oct 2026 09:42:47 +0000 https://sansargreen.org/?p=1984 पर्यावरणविद् राजीव सिंह ने पारंपरिक आदिवासी बुजुर्गों की उपस्थिति में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का किया शुभारंभ। सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत को डिजिटल माध्यम से सहेजने, औषधीय पौधों के संरक्षण और जंगलों की जैव विविधता बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण Read More ...

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पर्यावरणविद् राजीव सिंह ने पारंपरिक आदिवासी बुजुर्गों की उपस्थिति में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का किया शुभारंभ। सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत को डिजिटल माध्यम से सहेजने, औषधीय पौधों के संरक्षण और जंगलों की जैव विविधता बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल।

गिरिडीह, झारखंड | 8 अक्टूबर 2026

झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति होड़ोपैथी (Hodopathy), औषधीय पौधों और जंगलों से जुड़े ज्ञान को संरक्षित करने के उद्देश्य से गिरिडीह में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। पर्यावरणविद्, कृषि उद्यमी एवं सतत विकास के क्षेत्र में कार्यरत राजीव सिंह ने 8 अक्टूबर 2026 को होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों—Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com—का लोकार्पण किया।

गिरिडीह स्थित उनके आवासीय कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में आदिवासी समाज के पारंपरिक बुजुर्गों, स्थानीय ज्ञानधारकों, सामाजिक प्रतिनिधियों और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित आदिवासी ज्ञान को आधुनिक डिजिटल तकनीक से जोड़ना और इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना है।

इस पहल के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण के साथ-साथ औषधीय पौधों की पहचान, उनके संरक्षण, जंगलों की जैव विविधता, पर्यावरणीय जागरूकता तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को भी प्रोत्साहित करने की योजना है।

सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत को सहेजने का प्रयास

होड़ोपैथी झारखंड के आदिवासी समुदायों से जुड़ी एक पारंपरिक स्वदेशी चिकित्सा एवं वनस्पति ज्ञान प्रणाली है। यह पीढ़ियों से प्रकृति, जंगलों और स्थानीय औषधीय पौधों के साथ आदिवासी समाज के गहरे संबंधों को दर्शाती है।

आदिवासी समाज के बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों के पास स्थानीय वनस्पतियों की पहचान, उनके पारंपरिक उपयोग, संरक्षण तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन से संबंधित व्यापक अनुभवजन्य ज्ञान रहा है।

इस ज्ञान का बड़ा हिस्सा लिखित पुस्तकों के बजाय मौखिक परंपराओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता रहा है।

बदलती जीवनशैली, नई पीढ़ी का पारंपरिक ज्ञान से दूर होना, जंगलों का क्षरण और औषधीय पौधों के प्राकृतिक आवासों पर बढ़ते दबाव के कारण इस विरासत के संरक्षण की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।

ऐसी स्थिति में होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का शुभारंभ पारंपरिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने और उसके संरक्षण के लिए एक डिजिटल आधार तैयार करने का प्रयास है।

तीन वेबसाइटों के माध्यम से डिजिटल संरक्षण की शुरुआत

लोकार्पित तीनों वेबसाइटों का उद्देश्य होड़ोपैथी से संबंधित जानकारी, पारंपरिक ज्ञान, औषधीय पौधों और पर्यावरण संरक्षण के विषयों को व्यापक स्तर पर सामने लाना है।

Hodopathy.org के माध्यम से आदिवासी ज्ञान-विरासत, औषधीय पौधों और जैव विविधता संरक्षण से जुड़े विषयों को प्रोत्साहित करने की परिकल्पना की गई है।

Hodopathy.in का उद्देश्य होड़ोपैथी की पारंपरिक पृष्ठभूमि, स्वदेशी ज्ञान, वनस्पतियों और संभावित वैज्ञानिक अध्ययन से संबंधित जानकारी को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना है।

Hodopathy.com के माध्यम से जनजागरूकता, शैक्षणिक सामग्री और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण संबंधी गतिविधियों को व्यापक लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया जाएगा।

इन तीनों डिजिटल मंचों को भविष्य में पारंपरिक ज्ञानधारकों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों के बीच संवाद का माध्यम बनाने की परिकल्पना है।

आदिवासी बुजुर्गों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को बनाया विशेष

लोकार्पण कार्यक्रम की विशेषता आदिवासी समाज के पारंपरिक बुजुर्गों और स्थानीय ज्ञानधारकों की भागीदारी रही।

ये बुजुर्ग उस ज्ञान परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिसे उनके पूर्वजों ने सदियों तक अनुभव, अवलोकन और प्रकृति के साथ निरंतर संपर्क के माध्यम से संरक्षित रखा है।

कार्यक्रम में उनकी भागीदारी इस बात का प्रतीक रही कि होड़ोपैथी का संरक्षण केवल वेबसाइट बनाने या जानकारी एकत्र करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मूल ज्ञानधारकों का सम्मान और सक्रिय सहयोग आवश्यक है।

पहल के अंतर्गत भविष्य में अनुभवी बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों से संवाद स्थापित कर उनकी सहमति से ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की योजना है।

इस दौरान स्थानीय पौधों के नाम, उनकी पहचान, पारंपरिक उपयोग से जुड़े सांस्कृतिक संदर्भ तथा पर्यावरणीय अनुभवों को सुरक्षित रखने पर ध्यान दिया जाएगा।

राजीव सिंह की पहल: ज्ञान के साथ जंगलों को भी बचाना जरूरी

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत राजीव सिंह की यह पहल पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करती है।

आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ जंगलों, औषधीय वनस्पतियों, स्थानीय जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी रही हैं।

यदि जंगलों में पाए जाने वाले औषधीय पौधे समाप्त होते हैं, तो उनके साथ उनसे संबंधित पारंपरिक जानकारी के लुप्त होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

इसी प्रकार, यदि अनुभवी ज्ञानधारकों के अनुभवों को समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से से वंचित हो सकती हैं।

इसलिए होड़ोपैथी पहल का उद्देश्य केवल पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना नहीं, बल्कि औषधीय पौधों के संरक्षण, जंगलों की सुरक्षा और पर्यावरणीय जागरूकता को भी बढ़ावा देना है।

यह प्रयास सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण को एक-दूसरे से जोड़ता है।

गांडेय में होड़ोपैथी पार्क से औषधीय पौधों के संरक्षण को बढ़ावा

इस पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गिरिडीह जिले के गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क से भी जुड़ा है।

होड़ोपैथी पार्क की परिकल्पना औषधीय पौधों के संरक्षण, पहचान, संवर्धन और पर्यावरणीय शिक्षा को बढ़ावा देने वाले केंद्र के रूप में की गई है।

इसके माध्यम से स्थानीय स्तर पर औषधीय पौधों की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण तथा उनके पारंपरिक और पारिस्थितिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने की योजना है।

भविष्य में यहाँ विद्यार्थियों, युवाओं, पर्यावरण प्रेमियों और पारंपरिक ज्ञानधारकों के लिए शैक्षणिक एवं जागरूकता गतिविधियाँ आयोजित करने की संभावनाएँ भी हैं।

इस प्रकार डिजिटल दस्तावेजीकरण और धरातल पर वनस्पति संरक्षण के प्रयासों को एक साथ आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य किया जाएगा।

पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों का दस्तावेजीकरण और पुस्तक प्रकाशन की योजना

होड़ोपैथी पहल के अंतर्गत आदिवासी बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों को व्यवस्थित रूप से संकलित करने की योजना भी बनाई गई है।

इसका उद्देश्य स्थानीय ज्ञान, वनस्पतियों की पहचान, पारंपरिक प्रथाओं और उनसे जुड़े सांस्कृतिक अनुभवों को सुरक्षित रखना है।

इसके साथ ही अनुभवी ज्ञानधारकों की जानकारी और योगदान पर आधारित एक पुस्तक तैयार करने की भी परिकल्पना है।

इससे मौखिक परंपराओं में संरक्षित जानकारी को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाने में सहायता मिल सकती है।

हालाँकि, पारंपरिक उपचार संबंधी जानकारी का दस्तावेजीकरण और किसी उपचार की वैज्ञानिक प्रभावशीलता सिद्ध होना अलग-अलग विषय हैं। औषधीय उपयोगों की सुरक्षा एवं प्रभावशीलता का मूल्यांकन उपयुक्त वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से किया जाना आवश्यक होगा।

ज्ञान संग्रह के दौरान संबंधित समुदायों की सहमति, पारंपरिक अधिकारों और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का सम्मान करना भी इस पहल का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

वैज्ञानिक अनुसंधान और विश्वविद्यालयों से सहयोग की संभावनाएँ

होड़ोपैथी से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अध्ययन से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास करने की योजना है।

इसके अंतर्गत औषधीय पौधों की वैज्ञानिक पहचान, वनस्पति विविधता, संरक्षण तकनीकों और पारंपरिक उपयोगों से संबंधित अध्ययन की संभावनाएँ तलाशने का उद्देश्य है।

भविष्य में विश्वविद्यालयों, कृषि एवं वनस्पति अनुसंधान संस्थानों तथा विषय विशेषज्ञों के साथ सहयोग स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।

ऐसे सहयोग से पारंपरिक ज्ञान के जिम्मेदार दस्तावेजीकरण, वनस्पति संरक्षण और वैज्ञानिक समझ को आगे बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

युवाओं को जोड़कर अगली पीढ़ी तक पहुँचाई जाएगी विरासत

होड़ोपैथी पहल में युवाओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

आने वाले समय में स्थानीय युवाओं को औषधीय पौधों की पहचान, पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता संबंधी जागरूकता गतिविधियों से जोड़ने की योजना है।

युवा पीढ़ी डिजिटल तकनीक के माध्यम से बुजुर्गों के अनुभवों को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इसके लिए भविष्य में प्रशिक्षण कार्यक्रम, संवाद सत्र, वनस्पति पहचान गतिविधियाँ और पर्यावरणीय जागरूकता अभियान आयोजित करने की संभावनाएँ हैं।

इस प्रयास से पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के बीच एक सार्थक संबंध विकसित हो सकता है।

आदिवासी समुदायों के अधिकार और सम्मान को प्राथमिकता

पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण तभी सार्थक होगा, जब उसके मूल ज्ञानधारकों और संबंधित समुदायों के अधिकारों का सम्मान किया जाए।

होड़ोपैथी पहल में ज्ञान के दस्तावेजीकरण के दौरान संबंधित व्यक्तियों और समुदायों की सहमति, उनके योगदान की पहचान तथा संवेदनशील जानकारी के जिम्मेदार उपयोग को महत्व देने की बात कही गई है।

इसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से अलग किए बिना सुरक्षित रखना है।

भविष्य में किसी शोध, प्रकाशन या व्यावसायिक उपयोग की स्थिति में लागू कानूनी प्रावधानों और समुदायों के अधिकारों का पालन करना आवश्यक होगा।

झारखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की नई दिशा

झारखंड के आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ राज्य की सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का 8 अक्टूबर 2026 को हुआ लोकार्पण इस विरासत को डिजिटल माध्यम से संरक्षित करने की दिशा में एक शुरुआती कदम है।

इस पहल के माध्यम से पारंपरिक बुजुर्गों के अनुभवों, औषधीय पौधों के संरक्षण, जंगलों की जैव विविधता और वैज्ञानिक अध्ययन की संभावनाओं को एक साझा मंच से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

इसका दीर्घकालिक उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना है, जिसमें आदिवासी समाज की पारंपरिक जानकारी को सम्मान मिले, युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा मिले।

होड़ोपैथी की इस पहल का मूल संदेश है कि सदियों पुराने आदिवासी ज्ञान को बचाने के लिए उसके ज्ञानधारकों, औषधीय पौधों, जंगलों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।

Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com के माध्यम से इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा, ताकि झारखंड की अमूल्य आदिवासी ज्ञान-विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए जिम्मेदारीपूर्वक सुरक्षित रखा जा सके।


होड़ोपैथी पहल के बारे में

होड़ोपैथी पहल पर्यावरणविद् राजीव सिंह द्वारा गिरिडीह, झारखंड में आगे बढ़ाया जा रहा एक प्रयास है, जिसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण, औषधीय पौधों का संवर्धन, जंगलों की जैव विविधता की सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहन और युवाओं में पर्यावरणीय जागरूकता विकसित करना है।

आधिकारिक वेबसाइटें:

कार्यक्रम: होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों का लोकार्पण
तिथि: 8 अक्टूबर 2026
स्थान: गिरिडीह, झारखंड
लोकार्पणकर्ता: राजीव सिंह
प्रमुख सहभागी: पारंपरिक आदिवासी बुजुर्ग, स्थानीय ज्ञानधारक एवं सामुदायिक प्रतिनिधि
मुख्य उद्देश्य: आदिवासी ज्ञान-विरासत का डिजिटल संरक्षण, औषधीय पौधों का संवर्धन एवं वन जैव विविधता की सुरक्षा

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द टाइम्स ऑफ इंडिया में राजीव सिंह की पहल को प्रमुखता: आदिवासी ज्ञान, औषधीय पौधों और वन संरक्षण पर जोर https://sansargreen.org/times-of-india-rajeev-singh-medicinal-plant-conservation/ Sun, 11 Oct 2026 08:29:25 +0000 https://sansargreen.org/?p=1979 द टाइम्स ऑफ इंडिया | रांची संस्करण | 9 अक्टूबर 2026 झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी पारंपरिक ज्ञान-विरासत, औषधीय वनस्पतियों और जंगलों के संरक्षण के लिए पर्यावरणविद् एवं कृषि उद्यमी राजीव सिंह की पहल को देश के प्रमुख Read More ...

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द टाइम्स ऑफ इंडिया | रांची संस्करण | 9 अक्टूबर 2026

झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी पारंपरिक ज्ञान-विरासत, औषधीय वनस्पतियों और जंगलों के संरक्षण के लिए पर्यावरणविद् एवं कृषि उद्यमी राजीव सिंह की पहल को देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र द टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने 9 अक्टूबर 2026 के रांची संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया। समाचार में पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान-प्रणाली होड़ोपैथी के संरक्षण को पर्यावरणीय स्थिरता, जैव विविधता और वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने के प्रयासों को विशेष स्थान दिया गया।

गिरिडीह में आयोजित कार्यक्रम में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का शुभारंभ किया गया। इन डिजिटल मंचों का उद्देश्य आदिवासी बुजुर्गों, पारंपरिक वैद्यों और स्थानीय ज्ञानधारकों के अनुभवों को दस्तावेजीकृत करना तथा औषधीय पौधों से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है।

समाचार के अनुसार, अभियान तीन चरणों में आगे बढ़ेगा। पहले चरण में पारंपरिक ज्ञान का डिजिटल संग्रह तैयार किया जाएगा। दूसरे चरण में अनुभवी वैद्यों के अनुभवों और औषधीय वनस्पतियों पर पुस्तक प्रकाशित करने की योजना है। तीसरे चरण में युवाओं को पौधों की पहचान, संरक्षण और दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण देने के साथ शोध संस्थानों के सहयोग से वैज्ञानिक अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाएगा।

इस पहल से गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क को भी जोड़ा गया है, जिसके माध्यम से स्थानीय औषधीय पौधों के संरक्षण, संवर्धन और वन जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाने का उद्देश्य है।

राजीव सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए उससे जुड़े जंगलों, औषधीय पौधों और प्राकृतिक आवासों का संरक्षण भी आवश्यक है। अभियान में ज्ञानधारकों की सहमति, अधिकारों और योगदान का सम्मान करते हुए स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता दी जाएगी।

यह पहल पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रकृति संरक्षण के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक प्रयास है। इसका व्यापक उद्देश्य झारखंड की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामाजिक जागरूकता बढ़ाना है।

साभार: द टाइम्स ऑफ इंडिया, रांची संस्करण, पृष्ठ 5, 9 अक्टूबर 2026।

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प्रभात खबर में राजीव सिंह की होड़ोपैथी पहल को प्रमुखता: आदिवासी ज्ञान, औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण पर जोर https://sansargreen.org/prabhat-khabar-rajeev-singh-hodopathy-conservation-jharkhand/ Sun, 11 Oct 2026 06:49:00 +0000 https://sansargreen.org/?p=1976 प्रभात खबर | झारखंड संस्करण | 9 अक्टूबर 2026 झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी ज्ञान-विरासत, पारंपरिक चिकित्सा पद्धति होड़ोपैथी, औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण के लिए पर्यावरणविद् एवं कृषि उद्यमी राजीव सिंह की पहल को प्रभात खबर Read More ...

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प्रभात खबर | झारखंड संस्करण | 9 अक्टूबर 2026

झारखंड के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी ज्ञान-विरासत, पारंपरिक चिकित्सा पद्धति होड़ोपैथी, औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण के लिए पर्यावरणविद् एवं कृषि उद्यमी राजीव सिंह की पहल को प्रभात खबर ने अपने 9 अक्टूबर 2026 के अंक में प्रमुखता से स्थान दिया। समाचार में आदिवासी ज्ञान के दस्तावेजीकरण, जैव विविधता संरक्षण और इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के प्रयासों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

गिरिडीह में आयोजित कार्यक्रम में Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com का शुभारंभ किया गया। इन डिजिटल मंचों का उद्देश्य आदिवासी बुजुर्गों, पारंपरिक वैद्यों और स्थानीय ज्ञानधारकों के अनुभवों को व्यवस्थित रूप से संकलित और संरक्षित करना है। पीढ़ियों से मौखिक परंपराओं के माध्यम से आगे बढ़ता यह ज्ञान आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान के साथ प्रकृति और वनस्पतियों से उसके गहरे संबंध को भी दर्शाता है।

प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार, होड़ोपैथी संरक्षण अभियान को तीन चरणों में आगे बढ़ाने की योजना है। पहले चरण में पारंपरिक ज्ञान का डिजिटल संग्रह तैयार किया जाएगा। दूसरे चरण में अनुभवी वैद्यों के अनुभवों और औषधीय वनस्पतियों पर आधारित पुस्तक प्रकाशित की जाएगी। तीसरे चरण में युवाओं को औषधीय पौधों की पहचान, संरक्षण और दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण देने के साथ शोध संस्थानों के सहयोग से वैज्ञानिक अध्ययन की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा।

इस अभियान से गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क को भी जोड़ा गया है। इसके माध्यम से स्थानीय औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण एवं संवर्धन, वन जैव विविधता की सुरक्षा और पर्यावरण के प्रति सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। पहल का उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को केवल डिजिटल दस्तावेजों तक सीमित न रखकर उससे जुड़े प्राकृतिक संसाधनों और जंगलों के संरक्षण को भी प्रोत्साहित करना है।

राजीव सिंह ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आदिवासी समुदायों की ज्ञान-विरासत को सुरक्षित रखने के लिए उन औषधीय पौधों और जंगलों को बचाना भी आवश्यक है, जिनसे यह ज्ञान सदियों से जुड़ा रहा है। उन्होंने ज्ञानधारकों की सहमति, अधिकारों और योगदान के सम्मान को अभियान का महत्वपूर्ण आधार बताया।

इस पहल के माध्यम से आदिवासी बुजुर्गों के अनुभव, युवाओं की भागीदारी, डिजिटल तकनीक और वैज्ञानिक अनुसंधान को एक साझा संरक्षण प्रयास से जोड़ने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसका व्यापक उद्देश्य झारखंड की पारंपरिक ज्ञान-संपदा को सुरक्षित रखते हुए औषधीय पौधों, जंगलों और प्राकृतिक जैव विविधता के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है।

होड़ोपैथी संरक्षण की इस पहल को प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए प्रभात खबर का हार्दिक आभार। यह मीडिया कवरेज झारखंड की समृद्ध आदिवासी ज्ञान-परंपरा और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति व्यापक जनजागरूकता बढ़ाने में सहायक होगा।

साभार: प्रभात खबर, झारखंड संस्करण, 9 अक्टूबर 2026।

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गिरिडीह में होड़ोपैथी चिकित्सा पद्धति के संरक्षण की पहल: दैनिक जागरण में राजीव सिंह के अभियान को प्रमुखता https://sansargreen.org/dainik-jagran-hodopathy-conservation-rajeev-singh-giridih-2026/ Sat, 10 Oct 2026 05:43:42 +0000 https://sansargreen.org/?p=1969 झारखंड की सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत, पारंपरिक चिकित्सा पद्धति, औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण के लिए तीन वेबसाइटों का लोकार्पण। दैनिक जागरण | धनबाद संस्करण | 9 अक्टूबर 2026 गिरिडीह, झारखंड: पर्यावरणविद्, कृषि उद्यमी एवं सतत विकास के क्षेत्र Read More ...

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झारखंड की सदियों पुरानी आदिवासी ज्ञान-विरासत, पारंपरिक चिकित्सा पद्धति, औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण के लिए तीन वेबसाइटों का लोकार्पण।

दैनिक जागरण | धनबाद संस्करण | 9 अक्टूबर 2026

गिरिडीह, झारखंड: पर्यावरणविद्, कृषि उद्यमी एवं सतत विकास के क्षेत्र में सक्रिय राजीव सिंह द्वारा झारखंड की पारंपरिक आदिवासी चिकित्सा पद्धति होड़ोपैथी (Hodopathy) और उससे जुड़ी सदियों पुरानी ज्ञान-विरासत के संरक्षण के लिए शुरू किए गए अभियान को देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र दैनिक जागरण ने अपने 9 अक्टूबर 2026 के धनबाद संस्करण में प्रमुखता से स्थान दिया।

“गिरिडीह में होड़ोपैथी चिकित्सा पद्धति के संरक्षण की पहल” शीर्षक से प्रकाशित समाचार में आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, औषधीय पौधों के संरक्षण, जंगलों की जैव विविधता को सुरक्षित रखने तथा इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के प्रयासों को रेखांकित किया गया।

इस पहल के अंतर्गत राजीव सिंह के गिरिडीह स्थित आवासीय कार्यालय में तीन समर्पित डिजिटल मंचों — Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com — का लोकार्पण किया गया। इन वेबसाइटों के माध्यम से आदिवासी बुजुर्गों, अनुभवी पारंपरिक वैद्यों और स्थानीय वनस्पति जानकारों के अनुभवों एवं ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संकलित और संरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा।

यह अभियान गिरिडीह जिले के गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क से भी जुड़ा है, जिसके माध्यम से पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के साथ औषधीय पौधों के संवर्धन और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की योजना है।

सदियों पुराने आदिवासी ज्ञान को सहेजने का प्रयास

झारखंड के आदिवासी समुदायों के पास जंगलों, औषधीय पौधों और उनके पारंपरिक उपयोगों से संबंधित पीढ़ियों पुराना ज्ञान है। इस ज्ञान का बड़ा हिस्सा आज भी मौखिक परंपराओं और बुजुर्गों के अनुभवों में सुरक्षित है।

राजीव सिंह और उनकी टीम अनुभवी पारंपरिक वैद्यों, आदिवासी बुजुर्गों और स्थानीय जानकारों से संवाद कर उनके अनुभवों तथा औषधीय वनस्पतियों से जुड़ी जानकारी का दस्तावेजीकरण कर रही है। संकलित जानकारी की तथ्य-जाँच और उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य से तुलना भी की जा रही है।

इस प्रयास का उद्देश्य केवल पारंपरिक ज्ञान को दर्ज करना नहीं, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक संरक्षित करते हुए नई पीढ़ी और भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी बनाना है।

डिजिटल संग्रह, पुस्तक प्रकाशन और युवाओं को प्रशिक्षण

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, इस अभियान को तीन चरणों में आगे बढ़ाने की योजना है।

पहले चरण में पारंपरिक ज्ञान का डिजिटल संग्रह तैयार किया जाएगा। दूसरे चरण में वरिष्ठ पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों, औषधीय पौधों की पहचान और उनके पारंपरिक उपयोगों पर आधारित पुस्तक प्रकाशित की जाएगी।

तीसरे चरण में युवाओं को औषधीय वनस्पतियों की पहचान, संरक्षण और दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण देने की योजना है। इसके साथ शोध संस्थानों के सहयोग से चयनित पारंपरिक उपचार पद्धतियों की प्रभावशीलता और सुरक्षा पर वैज्ञानिक अध्ययन का भी प्रयास किया जाएगा।

औषधीय पौधों और जंगलों का संरक्षण भी आवश्यक

राजीव सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि होड़ोपैथी के ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए उन औषधीय पौधों और जंगलों का संरक्षण भी आवश्यक है, जिनसे यह परंपरा जुड़ी हुई है।

अभियान के माध्यम से स्थानीय औषधीय वनस्पतियों की पहचान, पौधरोपण, संवर्धन और जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।

उन्होंने पारंपरिक वैद्यों, आदिवासी बुजुर्गों, वनस्पति जानकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और सामाजिक संस्थाओं से इस अभियान में भागीदारी की अपील की। दस्तावेजीकरण में ज्ञानधारकों की सहमति, अधिकारों और योगदान के सम्मान को प्राथमिकता दी जाएगी।

लोकार्पण कार्यक्रम में समुदाय और सहयोगियों की भागीदारी

वेबसाइटों के लोकार्पण कार्यक्रम में सीए राकेश, रिमी सिंह, समन, शुभम, सोनाली, आंचल सिंह, आनंद मुर्मू, विनीता टुडू और मनोज हेंब्रम सहित पारंपरिक वैद्य, आदिवासी समाज के प्रतिनिधि और अन्य सहयोगी उपस्थित थे।

ज्ञान का संरक्षण, पौधों की सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और ज्ञान का प्रसार इस पहल के चार प्रमुख उद्देश्य हैं।

राजीव सिंह ने अभियान को प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए दैनिक जागरण का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी ज्ञान-विरासत, औषधीय वनस्पतियों और जंगलों के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है।

यह पहल झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को सहेजने के साथ पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण के बीच सार्थक संबंध स्थापित करने की दिशा में एक प्रयास है।

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प्रभात खबर में प्रमुखता से प्रकाशित: IIT (ISM) धनबाद और संसार ग्रीन सूखे पत्तों से तैयार करेंगे पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद https://sansargreen.org/prabhat-khabar-iit-ism-dhanbad-sansar-green-organic-manure-2/ Sat, 19 Sep 2026 11:54:49 +0000 https://sansargreen.org/?p=1933 16 सितंबर 2026 के धनबाद संस्करण में प्रभात खबर ने IIT (ISM) धनबाद और संसार ग्रीन की पहल को प्रमुखता से दी जगह; किसानों, मृदा स्वास्थ्य और जैविक खेती को मिलेगा लाभ धनबाद | 16 सितंबर 2026 आईआईटी (आईएसएम) धनबाद Read More ...

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16 सितंबर 2026 के धनबाद संस्करण में प्रभात खबर ने IIT (ISM) धनबाद और संसार ग्रीन की पहल को प्रमुखता से दी जगह; किसानों, मृदा स्वास्थ्य और जैविक खेती को मिलेगा लाभ

धनबाद | 16 सितंबर 2026

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान के इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन मिशन प्राइवेट लिमिटेड की सूखे पत्तों को पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदलने की पहल को प्रमुख हिंदी समाचार पत्र प्रभात खबर ने अपने धनबाद संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

16 सितंबर 2026 को प्रकाशित खबर में प्रभात खबर ने “आईआईटी आईएसएम में पत्तों से तैयार होगी पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद, किसानों को होगा फायदा” शीर्षक के साथ इस पहल को पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ कचरा प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य और जैविक खेती से जोड़कर प्रस्तुत किया है।

सूखे पत्तों को जलाने के बजाय बनेगी उपयोगी जैविक खाद

प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद अपने इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन के साथ मिलकर परिसर में पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियों को पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदलने की तैयारी कर रहा है।

इस पहल का उद्देश्य सूखी पत्तियों को जलाने या कचरे में फेंकने के बजाय उनका वैज्ञानिक उपयोग कर मिट्टी की सेहत सुधारना और जैविक खेती को बढ़ावा देना है।

प्रस्तावित परियोजना के तहत कैंपस और सार्वजनिक स्थानों से निकलने वाली सूखी पत्तियों को वैज्ञानिक तरीके से विघटित किया जाएगा। इसके बाद उनमें आवश्यक जैविक पोषक तत्व और लाभकारी सूक्ष्मजीव मिलाकर गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद तैयार करने की योजना है।

इस प्रक्रिया को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है:

सूखी पत्तियां → वैज्ञानिक अपघटन → पोषक तत्व → लाभकारी सूक्ष्मजीव → समृद्ध जैविक खाद → बेहतर मृदा स्वास्थ्य

IIT (ISM), संसार ग्रीन और जिला कृषि विभाग की सहभागिता

प्रभात खबर ने अपनी रिपोर्ट में इस पहल से जुड़े प्रमुख लोगों और संस्थाओं की भूमिका को भी रेखांकित किया है।

परियोजना पर हुई चर्चा में आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के डीन, इनोवेशन एंड कॉरपोरेट रिलेशंस प्रो. आलोक कुमार दास, संसार ग्रीन के निदेशक राजीव सिंह, धनबाद की जिला कृषि पदाधिकारी अंजना तथा आईआईटी (आईएसएम) के सहायक कुलसचिव मृत्युंजय शर्मा शामिल हुए।

प्रभात खबर की रिपोर्ट में इस परियोजना को IIT (ISM), संसार ग्रीन और धनबाद के जिला कृषि विभाग के साझा प्रयास से आगे बढ़ाए जाने का उल्लेख किया गया है।

कैंपस से किसानों तक पहुंचाने की योजना

इस परियोजना की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि तैयार जैविक खाद का उपयोग केवल संस्थान के भीतर सीमित रखने की योजना नहीं है।

प्रभात खबर के अनुसार, तैयार खाद का उपयोग संस्थान के उद्यान, नर्सरी, पौधरोपण, लैंडस्केपिंग, जैविक खेती और मिट्टी के पुनरुद्धार में किया जा सकेगा।

इसके साथ ही इसे किसानों, बागवानों, नर्सरी संचालकों और आम लोगों को भी उपलब्ध कराने की योजना है। इस तरह सूखी पत्तियों के प्रबंधन से शुरू होने वाली पहल का लाभ कृषि और मृदा स्वास्थ्य तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।

लाभकारी सूक्ष्मजीवों पर विशेष ध्यान

संसार ग्रीन की प्रस्तावित प्रक्रिया सामान्य पत्ती कम्पोस्टिंग तक सीमित नहीं है। इसमें वैज्ञानिक रूप से विघटित जैविक पदार्थ को आवश्यक पोषक तत्वों के साथ लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध करने की परिकल्पना की गई है।

इसका उद्देश्य ऐसा मूल्यवर्धित जैविक उत्पाद तैयार करना है जो मिट्टी में जैविक पदार्थ की उपलब्धता बढ़ाने के साथ मृदा स्वास्थ्य से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं को भी सहयोग दे सके।

संसार ग्रीन मृदा स्वास्थ्य, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी, जैविक कृषि और जैव-आधारित कृषि समाधानों पर काम कर रहा है। इसलिए यह परियोजना कंपनी के मौजूदा कार्यक्षेत्र को sustainable green-waste management के साथ जोड़ती है।

बड़े संस्थानों के लिए भी बन सकता है मॉडल

प्रभात खबर की रिपोर्ट में प्रो. आलोक कुमार दास के हवाले से सूखी पत्तियों को कचरा नहीं, बल्कि जैविक पदार्थ का महत्वपूर्ण स्रोत बताया गया है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि संस्थान ऐसा मॉडल तैयार करना चाहता है जिसे भविष्य में विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों, उद्योगों, हाउसिंग सोसायटियों और नगर निकायों द्वारा भी अपनाया जा सके।

इस दृष्टिकोण से परियोजना का महत्व IIT (ISM) धनबाद परिसर में उत्पन्न सूखी पत्तियों के प्रबंधन से आगे जाता है। सफल क्रियान्वयन की स्थिति में यह बड़े परिसरों में उत्पन्न होने वाले green waste के स्थानीय और उपयोगी प्रबंधन का एक उदाहरण बन सकता है।

प्रभात खबर ने किसानों से जुड़े पहलू को किया प्रमुखता से रेखांकित

इस खबर की खास बात यह है कि प्रभात खबर ने परियोजना के पर्यावरणीय पक्ष के साथ किसानों को होने वाले संभावित लाभ को भी अपने मुख्य शीर्षक में स्थान दिया है।

“आईआईटी आईएसएम में पत्तों से तैयार होगी पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद, किसानों को होगा फायदा”—यह शीर्षक परियोजना के Waste-to-Wealth मॉडल के साथ उसके कृषि उपयोग को भी सामने लाता है।

संसार ग्रीन के लिए इस पहल का उद्देश्य भी केवल सूखी पत्तियों का निस्तारण नहीं, बल्कि उनसे ऐसा उपयोगी जैविक संसाधन तैयार करना है जिसे मृदा स्वास्थ्य, पौधरोपण, नर्सरी और जैविक कृषि से जोड़ा जा सके।

Waste to Wealth से मिट्टी की सेहत तक

इस पहल के केंद्र में एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण विचार है—सूखी पत्तियां कचरा नहीं, बल्कि जैविक पदार्थ का एक उपयोगी स्रोत हैं।

उन्हें जलाने या फेंकने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से संसाधित करके मिट्टी तक वापस पहुंचाया जा सकता है।

सूखी पत्तियां → जैविक संसाधन → पोषक एवं माइक्रोबियल संवर्धन → समृद्ध जैविक खाद → स्वस्थ मिट्टी

प्रभात खबर जैसे प्रमुख समाचार पत्र द्वारा इस पहल को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और जैविक कृषि से जुड़े इस विषय को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण है।

संसार ग्रीन का प्रयास विज्ञान, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी और व्यावहारिक कार्यान्वयन को जोड़ते हुए ऐसे समाधान विकसित करना है, जिनसे जैविक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो और उन्हें पुनः मिट्टी के प्राकृतिक चक्र में लौटाया जा सके।

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