AgriTech Jharkhand Archives - Sansar Green https://sansargreen.org/tag/agritech-jharkhand/ (प्रयोगशाला से खेत तक, ज्ञान से समृद्धि तक) Fri, 02 Oct 2026 15:41:14 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.4 https://sansargreen.org/wp-content/uploads/2026/10/Logo-Sansar-Green-Small.png AgriTech Jharkhand Archives - Sansar Green https://sansargreen.org/tag/agritech-jharkhand/ 32 32 कृषि शिक्षा से खेत तक: गढ़वा विश्वविद्यालय में राजीव सिंह का किसान-केंद्रित दृष्टिकोण https://sansargreen.org/rajeev-singh-garhwa-university-agriculture-farmers-rural-entrepreneurship/ Sat, 26 Sep 2026 13:15:52 +0000 https://sansargreen.org/?p=1942 गढ़वा विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में उद्योग विशेषज्ञ के रूप में सहभागी राजीव सिंह ने कृषि शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों और ग्रामीण उद्यमिता के बीच मजबूत संबंध विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों Read More ...

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गढ़वा विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में उद्योग विशेषज्ञ के रूप में सहभागी राजीव सिंह ने कृषि शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों और ग्रामीण उद्यमिता के बीच मजबूत संबंध विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों में विकसित ज्ञान की वास्तविक सफलता तब है, जब उसका प्रभाव किसान के खेत, ग्रामीण युवाओं के अवसर और स्थानीय अर्थव्यवस्था में दिखाई दे।

संसार ग्रीन के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक राजीव सिंह की गढ़वा विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में सहभागिता केवल एक औपचारिक शैक्षणिक अवसर नहीं थी। यह उनके उस व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का मंच बनी, जिसमें शिक्षा, कृषि विज्ञान, उद्यमिता और ग्रामीण समाज को एक साझा विकास प्रक्रिया से जोड़ने की परिकल्पना है।

समारोह में झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कुलाधिपति दिनेश सिंह, कुलपति डॉ. एम. के. सिंह, वरिष्ठ शिक्षाविदों, विषय विशेषज्ञों और विश्वविद्यालय समुदाय की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम ने शिक्षा और समाज के बीच संबंधों पर व्यापक संवाद का अवसर प्रदान किया।

उद्योग विशेषज्ञ के रूप में राजीव सिंह ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक समुदाय के साथ अपने विचार साझा किए और विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में संस्थागत ज्ञान को जमीनी जरूरतों से जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा की।

Rajeev Singh on stage with Jharkhand Governor Santosh Kumar Gangwar, university leadership and dignitaries during the First Convocation of Garhwa University.
गढ़वा विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह के मंच पर झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार, विश्वविद्यालय नेतृत्व एवं अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ संसार ग्रीन के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक राजीव सिंह।

विश्वविद्यालय और किसान के बीच दूरी कम करनी होगी

भारत में कृषि से संबंधित विश्वविद्यालयों और संस्थानों के पास वैज्ञानिक ज्ञान, शोध क्षमता और विशेषज्ञता का बड़ा आधार मौजूद है। दूसरी ओर किसान प्रतिदिन मिट्टी, मौसम, फसल रोग, उत्पादन लागत, बाजार और बदलती कृषि परिस्थितियों जैसी वास्तविक चुनौतियों का सामना करते हैं।

राजीव सिंह के अनुसार भविष्य की कृषि व्यवस्था में इन दोनों पक्षों के बीच दूरी कम करना आवश्यक है।

उनका दृष्टिकोण एक ऐसे दो-तरफा ज्ञान तंत्र का है, जिसमें वैज्ञानिक केवल किसानों तक तकनीक पहुँचाने तक सीमित न रहें, बल्कि किसान की वास्तविक समस्याएँ भी विश्वविद्यालय और शोधकर्ताओं तक पहुँचें।

खेत समस्या बताए और विज्ञान समाधान खोजने में सहयोग करे—यही प्रभावी कृषि अनुसंधान की दिशा होनी चाहिए।

गिरिडीह के किसानों तक संस्थागत विशेषज्ञता पहुँचाने की सोच

गढ़वा विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों के साथ संवाद के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि विश्वविद्यालयों में उपलब्ध विशेषज्ञता और तकनीकी ज्ञान को गिरिडीह सहित झारखंड के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों तक किस प्रकार पहुँचाया जा सकता है।

इसमें मृदा स्वास्थ्य, फसल प्रबंधन, टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ, जैविक एवं सूक्ष्मजीव आधारित कृषि तकनीक, किसान प्रशिक्षण, कौशल विकास और कृषि उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में ज्ञान साझा करने की संभावनाएँ शामिल हैं।

राजीव सिंह का मानना है कि किसान को केवल कृषि उत्पाद उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उसे यह समझने में भी सहयोग मिलना चाहिए कि उसकी मिट्टी की वास्तविक स्थिति क्या है, किस फसल के लिए कौन-सी तकनीक उपयोगी है, उत्पादन लागत कैसे कम की जा सकती है और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कैसे हो सकता है।

Rajeev Singh receiving a traditional Tilak and floral welcome at Garhwa University during his participation as an Industry Expert at the First Convocation.
गढ़वा विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह के अवसर पर उद्योग विशेषज्ञ के रूप में पहुंचे संसार ग्रीन के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक राजीव सिंह का तिलक एवं पुष्पों के साथ पारंपरिक स्वागत।

“प्रयोगशाला से खेत तक पहुँचना चाहिए कृषि नवाचार”

राजीव सिंह के कृषि संबंधी दृष्टिकोण का एक प्रमुख सिद्धांत है कि वैज्ञानिक उपलब्धि का मूल्य उसके व्यावहारिक प्रभाव से तय होना चाहिए।

“कृषि अनुसंधान की यात्रा प्रयोगशाला या शोध पत्र पर समाप्त नहीं होनी चाहिए। उसकी वास्तविक सफलता किसान के खेत में दिखाई देनी चाहिए। विश्वविद्यालय ज्ञान विकसित करें, उद्यम उसे व्यावहारिक रूप देने में सहयोग करें और किसान उस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में रहे।”

यही सोच विश्वविद्यालय–उद्योग–किसान सहयोग के एक ऐसे मॉडल की आवश्यकता को रेखांकित करती है, जिसमें प्रत्येक पक्ष अपनी विशिष्ट क्षमता के साथ योगदान करे।

विश्वविद्यालय अनुसंधान और विशेषज्ञता दें, कृषि उद्यम तकनीक को व्यावहारिक तथा सुलभ बनाने में सहयोग करें और किसानों के अनुभव से शोध तथा समाधान दोनों को जमीनी वास्तविकताओं से जोड़ा जाए।

खेती से आगे—ग्रामीण उद्यमिता की नई संभावनाएँ

राजीव सिंह कृषि को केवल उत्पादन से नहीं, बल्कि ग्रामीण आर्थिक अवसरों के निर्माण से भी जोड़कर देखते हैं।

भारत के ग्रामीण युवाओं के सामने कृषि आधारित उद्यमिता का एक बड़ा क्षेत्र विकसित हो रहा है। जैविक कृषि इनपुट, माइक्रोबियल तकनीक, पौध पोषण, नर्सरी, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रेडिंग एवं पैकेजिंग, मूल्य संवर्धन, डिजिटल कृषि सेवाएँ और बाजार संपर्क जैसे क्षेत्रों में नए उद्यम विकसित किए जा सकते हैं।

ऐसे अवसर तभी व्यापक प्रभाव पैदा करेंगे जब युवाओं को शिक्षा के साथ व्यावहारिक कौशल, तकनीकी मार्गदर्शन और उद्यमिता की समझ भी मिले।

इसीलिए विश्वविद्यालयों की भूमिका डिग्री प्रदान करने तक सीमित न रहकर छात्रों को वास्तविक कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समस्याओं से जोड़ने की भी हो सकती है।

छात्रों को रोजगार खोजने वाला ही नहीं, अवसर बनाने वाला बनाना

कृषि शिक्षा का भविष्य युवाओं को केवल नौकरी के लिए तैयार करने में नहीं, बल्कि उन्हें समस्या पहचानने, समाधान विकसित करने और उद्यम खड़ा करने की क्षमता देने में भी है।

कृषि विश्वविद्यालय और उद्योग यदि मिलकर छात्रों को किसानों की वास्तविक समस्याओं पर काम करने, फील्ड प्रोजेक्ट करने, तकनीक समझने और कृषि व्यवसाय के मॉडल विकसित करने का अवसर दें, तो ग्रामीण क्षेत्रों से नई पीढ़ी के कृषि उद्यमी तैयार किए जा सकते हैं।

यह मॉडल छात्रों, किसानों और विश्वविद्यालय—तीनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

संसार ग्रीन की भूमिका: विज्ञान और किसान के बीच व्यावहारिक सेतु

संसार ग्रीन के माध्यम से राजीव सिंह कृषि विज्ञान और किसान के बीच एक व्यावहारिक सेतु विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

उनका व्यापक उद्देश्य वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, मृदा स्वास्थ्य, जैविक एवं माइक्रोबियल समाधानों, किसान प्रशिक्षण और तकनीक आधारित कृषि सेवाओं को ग्रामीण समुदायों के अधिक करीब लाना है।

शैक्षणिक संस्थानों के साथ संवाद इसी सोच का विस्तार है—जहाँ उद्योग केवल व्यावसायिक भागीदार न होकर ज्ञान को जमीनी प्रभाव में बदलने वाला सहयोगी बने।

विश्वविद्यालय + विज्ञान + उद्यम + किसान

राजीव सिंह भविष्य की कृषि व्यवस्था को चार महत्वपूर्ण स्तंभों के सहयोग के रूप में देखते हैं:

विश्वविद्यालय ज्ञान विकसित करे।
वैज्ञानिक समाधान खोजें।
उद्यम समाधान को व्यावहारिक और सुलभ बनाए।
और किसान पूरी व्यवस्था के केंद्र में रहे।

गढ़वा विश्वविद्यालय में हुआ संवाद इसी सोच को आगे बढ़ाने का अवसर बना।

आगे किसान प्रशिक्षण, विशेषज्ञ संवाद, तकनीकी मार्गदर्शन, छात्रों के लिए कृषि उद्यमिता संबंधी गतिविधियों और संस्थागत ज्ञान के आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ ग्रामीण कृषि व्यवस्था के लिए उपयोगी मॉडल विकसित कर सकती हैं।

Rajeev Singh with Vice-Chancellor Dr. M. K. Singh and the university team at Garhwa University during the First Convocation and academic interaction.
गढ़वा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एम. के. सिंह एवं विश्वविद्यालय की टीम के साथ संसार ग्रीन के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक राजीव सिंह—कृषि शिक्षा, किसान कल्याण और ग्रामीण उद्यमिता को आगे बढ़ाने पर सार्थक संवाद।

ज्ञान तभी सार्थक है, जब समाज तक पहुँचे

गढ़वा विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में उद्योग विशेषज्ञ के रूप में राजीव सिंह की सहभागिता उनके व्यापक सार्वजनिक दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करती है—शिक्षा और संस्थागत ज्ञान का अंतिम उद्देश्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए।

कृषि के संदर्भ में इसका अर्थ है कि शोध किसान तक पहुँचे, तकनीक स्थानीय समस्याओं का समाधान करे, युवाओं को नए अवसर मिलें और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक सक्षम बने।

राजीव सिंह इसी दिशा में शैक्षणिक संस्थानों, कृषि विशेषज्ञों, उद्यमियों, युवाओं और किसानों के बीच सहयोग का एक मजबूत नेटवर्कविकसित करने की आवश्यकता देखते हैं।

उनकी सोच का सार एक सरल सिद्धांत में समाहित है:

“ज्ञान विश्वविद्यालय में जन्म ले सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक पहचान तब बनती है जब वह खेत, किसान और समाज के जीवन में बदलाव लाए।”

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दैनिक हिन्दुस्तान में प्रमुखता से प्रकाशित: IIT (ISM) धनबाद और संसार ग्रीन की पहल से सूखे पत्ते बनेंगे समृद्ध जैविक खाद https://sansargreen.org/dainik-hindustan-iit-ism-dhanbad-sansar-green-dry-leaves/ Sat, 19 Sep 2026 09:33:49 +0000 https://sansargreen.org/?p=1928 16 सितंबर 2026 के धनबाद संस्करण में दैनिक हिन्दुस्तान ने “सूखे पत्तों को ऑर्गेनिक खाद में बदलने की तैयारी” शीर्षक से प्रकाशित की खबर धनबाद | 16 सितंबर 2026 आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान के इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन मिशन Read More ...

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16 सितंबर 2026 के धनबाद संस्करण में दैनिक हिन्दुस्तान ने “सूखे पत्तों को ऑर्गेनिक खाद में बदलने की तैयारी” शीर्षक से प्रकाशित की खबर

धनबाद | 16 सितंबर 2026

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान के इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन मिशन प्राइवेट लिमिटेड की सूखे पत्तों को उपयोगी जैविक खाद में बदलने की प्रस्तावित पहल को दैनिक हिन्दुस्तान ने अपने धनबाद संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

16 सितंबर 2026 को प्रकाशित खबर में दैनिक हिन्दुस्तान ने “सूखे पत्तों को ऑर्गेनिक खाद में बदलने की तैयारी” शीर्षक के साथ इस पहल को पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबल वेस्ट मैनेजमेंट की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया है।

[यहां दैनिक हिन्दुस्तान की प्रकाशित न्यूज कटिंग लगाएं]

सूखे पत्तों को कचरा नहीं, उपयोगी संसाधन बनाने की पहल

दैनिक हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद अपने इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन के साथ मिलकर पेड़ों से गिरने वाले सूखे और बेकार पत्तों को पोषक तत्वों से समृद्ध जैविक खाद में बदलने की तैयारी कर रहा है।

इस पहल का उद्देश्य सूखी पत्तियों को जलाने या बेकार फेंकने के बजाय उनका उपयोग करना, मिट्टी की सेहत सुधारना और जैविक खेती को बढ़ावा देना है।

बड़े संस्थागत परिसरों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां निकलती हैं। इन्हें जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ सकता है, जबकि गलत तरीके से फेंकने पर इनमें मौजूद उपयोगी जैविक पदार्थ भी बेकार चला जाता है।

इसी समस्या को एक उपयोगी संसाधन में बदलना इस पहल की मूल अवधारणा है।

IIT (ISM) धनबाद में हुई रणनीतिक चर्चा

दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित रिपोर्ट में परियोजना को लेकर आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में हुई रणनीतिक चर्चा का भी उल्लेख किया गया है।

इस चर्चा में प्रो. आलोक कुमार दास, डीन, इनोवेशन एंड कॉरपोरेट रिलेशंस, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद; संसार ग्रीन के निदेशक राजीव सिंह; धनबाद की जिला कृषि पदाधिकारी अंजना; तथा आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के सहायक कुलसचिव मृत्युंजय शर्मा शामिल हुए।

परियोजना के तहत सूखी पत्तियों को वैज्ञानिक प्रक्रिया से उपयोगी जैविक खाद में बदलने और उन्हें मिट्टी के लिए पुनः उपयोगी बनाने की दिशा में काम किया जाना प्रस्तावित है।

पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य को एक साथ जोड़ने का प्रयास

संसार ग्रीन के लिए यह पहल केवल सूखी पत्तियों के निस्तारण का विषय नहीं है। इसका उद्देश्य green waste management को मृदा स्वास्थ्य और जैविक कृषि से जोड़ना है।

सूखी पत्तियां अपने आप में जैविक पदार्थ का स्रोत हैं। उचित वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से इन्हें उपयोगी जैविक खाद में परिवर्तित कर पुनः मिट्टी तक पहुंचाया जा सकता है।

इस मॉडल का मूल विचार है:

सूखी पत्तियां → वैज्ञानिक प्रसंस्करण → समृद्ध जैविक खाद → बेहतर मृदा स्वास्थ्य → जैविक खेती

इस प्रकार जो जैविक पदार्थ पेड़ और मिट्टी से उत्पन्न हुआ है, उसे कचरे के रूप में नष्ट करने के बजाय दोबारा मिट्टी के जैविक चक्र में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है।

दैनिक हिन्दुस्तान की खबर ने पहल के पर्यावरणीय महत्व को किया रेखांकित

दैनिक हिन्दुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया कि सूखी पत्तियों को जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जबकि उनका वैज्ञानिक उपयोग पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की सेहत—दोनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

रिपोर्ट में प्रो. आलोक कुमार दास के हवाले से भी इस विचार को सामने रखा गया है कि सूखे पत्ते केवल कचरा नहीं, बल्कि जैविक पदार्थ का एक उपयोगी स्रोत हैं।

संसार ग्रीन का प्रयास इसी संसाधन को वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके से उपयोग में लाकर Waste-to-Wealth की अवधारणा को जमीन पर लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना है।

संसार ग्रीन की प्रतिबद्धता

संसार ग्रीन मिशन प्राइवेट लिमिटेड मृदा स्वास्थ्य, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी, जैविक कृषि और पर्यावरण-अनुकूल समाधानों पर कार्य कर रहा है। IIT (ISM) धनबाद के साथ प्रस्तावित यह पहल संस्थागत स्तर पर उत्पन्न होने वाले सूखे पत्तों के बेहतर उपयोग का एक व्यावहारिक मॉडल विकसित करने की दिशा में प्रयास है।

दैनिक हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख समाचार पत्र में इस पहल का प्रकाशन इस विषय को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संसार ग्रीन का मानना है कि सूखी पत्तियों को समस्या के रूप में देखने के बजाय उन्हें मिट्टी के लिए उपयोगी संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है—

“कचरे में नहीं, मिट्टी में लौटें सूखे पत्ते।”

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IIT (ISM) धनबाद और संसार ग्रीन मिलकर सूखे पत्तों से बनाएंगे पोषक तत्वों से समृद्ध जैविक खाद https://sansargreen.org/iit-ism-%e0%a4%a7%e0%a4%a8%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2/ Sat, 19 Sep 2026 06:57:26 +0000 https://sansargreen.org/?p=1922 सूखी पत्तियों को कचरे में फेंकने या जलाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करने की पहल; लाभकारी सूक्ष्मजीवों और आवश्यक पोषक तत्वों से समृद्ध कर तैयार की जाएगी जैविक खाद धनबाद | सितंबर 2026 आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान Read More ...

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सूखी पत्तियों को कचरे में फेंकने या जलाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करने की पहल; लाभकारी सूक्ष्मजीवों और आवश्यक पोषक तत्वों से समृद्ध कर तैयार की जाएगी जैविक खाद

धनबाद | सितंबर 2026

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद और संस्थान में इनक्यूबेटेड स्टार्टअप संसार ग्रीन मिशन प्राइवेट लिमिटेड मिलकर परिसर में पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियों को उपयोगी जैविक खाद में बदलने की दिशा में काम कर रहे हैं। प्रस्तावित परियोजना के तहत सूखी पत्तियों को वैज्ञानिक तरीके से अपघटित कर उनमें आवश्यक पोषक तत्व और लाभकारी सूक्ष्मजीव मिलाकर पोषक तत्वों से समृद्ध जैविक खाद तैयार की जाएगी।

इस पहल का उद्देश्य सूखी पत्तियों को केवल कचरा मानकर नष्ट करने के बजाय उन्हें दोबारा मिट्टी के लिए उपयोगी संसाधन में बदलना है। इससे हरित कचरे के बेहतर प्रबंधन के साथ मृदा स्वास्थ्य, जैविक खेती, संसाधन पुनर्प्राप्ति और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने की दिशा में एक व्यावहारिक मॉडल विकसित करने का प्रयास किया जाएगा।

IIT (ISM) धनबाद में परियोजना पर हुई चर्चा

परियोजना को लेकर आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में हुई रणनीतिक चर्चा में डीन, इनोवेशन एंड कॉरपोरेट रिलेशंस प्रो. आलोक कुमार दास, संसार ग्रीन के निदेशक राजीव सिंह, धनबाद की जिला कृषि पदाधिकारी अंजना तथा आईआईटी (आईएसएम) के सहायक कुलसचिव मृत्युंजय शर्मा शामिल हुए।

बैठक में सूखी पत्तियों के वैज्ञानिक प्रबंधन, उत्पादन प्रक्रिया, आवश्यक संसाधनों, माइक्रोबियल एनरिचमेंट, तैयार जैविक खाद के उपयोग और परियोजना को व्यावहारिक रूप से लागू करने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।

[यहां सोफे पर बैठकर चर्चा वाली तस्वीर लगाएं]

सूखी पत्तियों को वापस मिट्टी तक पहुंचाने का प्रयास

पेड़ों से गिरने वाली पत्तियां प्राकृतिक रूप से जैविक पदार्थ का स्रोत होती हैं। लेकिन बड़ी मात्रा में जमा होने पर इनके प्रबंधन की समस्या उत्पन्न होती है। पत्तियों को जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जबकि उन्हें सामान्य कचरे के साथ फेंक देने पर उनमें मौजूद जैविक पदार्थ का उपयोग नहीं हो पाता।

इसी समस्या को अवसर में बदलते हुए प्रस्तावित परियोजना में सूखी पत्तियों को वैज्ञानिक तरीके से डीकंपोज किया जाएगा। इसके बाद तैयार जैविक पदार्थ को आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध कर मूल्यवर्धित जैविक खाद के रूप में विकसित करने की योजना है।

प्रस्तावित प्रक्रिया:

सूखी पत्तियां → वैज्ञानिक अपघटन → पोषक तत्वों का संवर्धन → लाभकारी सूक्ष्मजीव → समृद्ध जैविक खाद → मिट्टी में पुनः उपयोग

मृदा स्वास्थ्य और माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी पर विशेष ध्यान

संसार ग्रीन इस पहल को केवल सामान्य पत्ती कम्पोस्टिंग तक सीमित रखने के बजाय मृदा स्वास्थ्य से जोड़कर विकसित करने पर काम कर रहा है।

प्रस्तावित प्रक्रिया में वैज्ञानिक रूप से अपघटित पत्तियों में आवश्यक जैविक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों को शामिल किया जाएगा। इससे तैयार खाद का उपयोग कैंपस गार्डन, नर्सरी, पौधरोपण, लैंडस्केपिंग, जैविक खेती और मृदा सुधार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकेगा।

संसार ग्रीन के लिए यह परियोजना मृदा स्वास्थ्य, माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी और जैविक कृषि से जुड़े अपने अनुभव को sustainable green-waste management के साथ जोड़ने का अवसर भी है।

परियोजना में संसार ग्रीन करेगा निवेश

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत परियोजना के लिए आवश्यक मशीनरी, उपकरण, मानव संसाधन, उत्पादन और अन्य परिचालन खर्च संसार ग्रीन द्वारा वहन किए जाएंगे। वहीं आईआईटी (आईएसएम) धनबाद उत्पादन और तैयार जैविक खाद के भंडारण के लिए आवश्यक स्थान उपलब्ध कराएगा।

इस प्रकार संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर और संसार ग्रीन की तकनीकी एवं परिचालन क्षमता को एक साथ जोड़कर एक व्यावहारिक Waste-to-Wealth मॉडल विकसित करने का प्रयास किया जाएगा।

Rajeev Singh of Sansar Green during a meeting at IIT (ISM) Dhanbad on the project to convert dry leaves into enriched organic manure.
IIT (ISM) Dhanbad and Sansar Green discuss the proposed project for scientific utilisation of dry leaves and production of enriched organic manure.

कैंपस से किसानों तक पहुंचाने की योजना

इस परियोजना के तहत तैयार जैविक खाद का उपयोग आईआईटी (आईएसएम) परिसर के उद्यानों, नर्सरी, पौधरोपण और लैंडस्केपिंग में किया जा सकेगा। इसके साथ इसे किसानों, बागवानों, नर्सरी संचालकों और आम लोगों को भी उपलब्ध कराने की योजना है।

इससे परियोजना का उद्देश्य केवल कैंपस के सूखे पत्तों का निस्तारण करना नहीं रहेगा, बल्कि उनसे तैयार उपयोगी जैविक संसाधन को कृषि, बागवानी और मृदा स्वास्थ्य से जोड़ना भी होगा।

भविष्य में सफल मॉडल विकसित होने पर विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों, उद्योगों, हाउसिंग सोसायटियों और नगर निकायों जैसे ऐसे स्थानों पर भी इस अवधारणा को अपनाने की संभावना देखी जा सकती है, जहां बड़ी मात्रा में biodegradable green waste उत्पन्न होता है। इस व्यापक उपयोग की संभावना का उल्लेख परियोजना से जुड़ी प्रकाशित रिपोर्टों में भी किया गया है।

Waste to Wealth: कचरे से संसाधन की ओर

इस पहल का मूल विचार बहुत सरल है—पेड़ से गिरने के बाद पत्ती का उपयोग समाप्त नहीं हो जाता।

उचित वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से उसी पत्ती के जैविक पदार्थ को उपयोगी खाद में बदलकर दोबारा मिट्टी तक पहुंचाया जा सकता है।

संसार ग्रीन और आईआईटी (आईएसएम) धनबाद की यह पहल इसी प्राकृतिक चक्र को विज्ञान और माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ने का प्रयास है।

सूखी पत्तियां → जैविक संसाधन → समृद्ध जैविक खाद → स्वस्थ मिट्टी → बेहतर पौध विकास

इस प्रकार जो जैविक पदार्थ मिट्टी और पेड़ों से आया है, उसे वैज्ञानिक तरीके से उपयोगी बनाकर पुनः मिट्टी तक पहुंचाना इस परियोजना की मूल अवधारणा है।

Related Media Coverage

इस पहल को मीडिया में भी स्थान मिला है। 15 सितंबर 2026 को दैनिक जागरण ने परियोजना पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें सूखी पत्तियों से जैविक खाद तैयार करने, संसार ग्रीन की भूमिका और तैयार खाद को किसानों तथा अन्य उपयोगकर्ताओं तक उपलब्ध कराने की योजना का उल्लेख किया गया।

Read the Dainik Jagran coverage

Three Societies ने भी 15 सितंबर 2026 को इस पहल पर रिपोर्ट प्रकाशित की और इसे sustainable waste management, soil health तथा organic farming से जोड़ा।

Read the Three Societies coverage

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Championing Green Agriculture: Sansar Green Founder Rajeev Singh Honoured in Ranchi https://sansargreen.org/rajeev-singh-sansar-green-organic-farming-vision-jharkhand/ Thu, 20 Aug 2026 15:45:57 +0000 https://sansargreen.org/?p=1888 Championing Green Agriculture: Sansar Green Founder Rajeev Singh Honoured in Ranchi Recently, Usha Martin University in Ranchi hosted a pivotal discussion on the future of organic farming, marking the occasion by honouring Rajeev Singh, the visionary Founder of Sansar Green and Read More ...

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Championing Green Agriculture: Sansar Green Founder Rajeev Singh Honoured in Ranchi

Recently, Usha Martin University in Ranchi hosted a pivotal discussion on the future of organic farming, marking the occasion by honouring Rajeev Singh, the visionary Founder of Sansar Green and Harit Sansar. The recognition highlights his extensive contributions to agricultural innovation, environmental conservation, and the empowerment of local farming communities across Jharkhand. 🌱

During an engaging session with the University’s Director and senior faculty, Singh outlined a collaborative roadmap for sustainable agriculture, emphasizing the critical intersection of research, technology, and rural entrepreneurship.

🌿 A New Agricultural Era for Jharkhand

Jharkhand possesses immense untapped potential for natural farming, driven by its rich biodiversity and heritage of traditional agriculture. However, unlocking this potential requires bridging the gap between ancestral farming knowledge and modern scientific advancements. Singh emphasized that the state can pioneer its own distinct agricultural model by adopting need-based farming over generalized chemical applications.

Rajeev Singh, Founder of Sansar Green and Harit Sansar, being honoured at Usha Martin University, Ranchi, following a meaningful discussion on the future of organic farming, soil health, agricultural innovation and farmer empowerment in Jharkhand.

🔬 Integrating Science with Soil

A core focus of the discussion was the necessity of scientific intervention tailored to local ecosystems. Because nutrient levels vary drastically across different terrains, Sansar Green champions a localized approach, focusing on:

  • Conducting rigorous soil testing to determine precise crop requirements.
  • Developing soil-specific bio-inputs and microbial solutions.
  • Providing customized crop advisories suited to local climatic conditions.
  • Delivering hands-on technical guidance and robust farmer training.

👨‍🌾 Cultivating Youth Entrepreneurship

Beyond improving crop yields, organic agriculture is poised to become a major driver of economic growth and youth employment in the region. By treating agriculture as a dynamic hub for innovation, new livelihood opportunities are emerging. Key growth areas for rural communities include:

  • Bio-input manufacturing and sustainable agricultural processing.
  • Value addition, eco-friendly packaging, and agri-tech startups.
  • Strengthening supply chains and market linkages.

🚜 The “From Soil to Mandi” Ecosystem

Through the broader social initiative of Harit Sansar, this agricultural mission extends to environmental awareness, soil conservation, and community-led afforestation. Singh’s ultimate vision is encapsulated in the “From Soil to Mandi” framework—an integrated ecosystem that supports the farmer from the very first soil test all the way to profitable market access.

“This honour is not merely an achievement; it gives me greater responsibility and renewed motivation. My dream is to see Jharkhand’s farmers understand the true potential of their soil and become more self-reliant and prosperous through science, organic farming, and modern technology.” — Rajeev Singh

By uniting academia, scientists, youth, and farmers, this collaborative effort promises a greener, more prosperous future for Jharkhand. 🌾

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